95 वर्ष पुराना एक दुर्लभ एवं महत्त्वपूर्ण लेख...
• वेदों की संसार के लिये आवश्यकता • (गतांक से आगे – तीसरी क़िस्त)
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-- पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय
हमने गत लेख में यह दिखाया है कि मनु आदि के समय में वेद पढ़ना जीवन का मुख्य उद्देश्य समझा जाता था। इस समय न वह लोग वेद पढ़ते हैं जो अपने को वेदानुयायी कहते हैं और न वह जो वेदानुयायो नहीं हैं।
अब प्रश्न यह है कि क्या वेदों की संसार के लिये कुछ आवश्यकता भी है?
कणाद मुनि ने धर्म का लक्षण इस प्रकार किया है - यतोऽभ्युदयनिश्रेयससिद्धिः स धर्मः (वैशेषिक दर्शन १।१।२) - "जिससे सांसारिक उन्नति के साथ साथ परलोक भी सुधरता हो वह धर्म है।"
अब वह आगे के सूत्र में कहते हैं - तद् वचनाद् आम्नायस्य प्रामाण्यम्। (वै० १।१।३) “धर्म के विषय में वेद का प्रमाण माना जाता है क्योंकि वेद ईश्वर का वचन है।"
इसका अर्थ यह हुआ कि जो पुरुष चाहता है कि इस जीवन में पूर्ण उन्नति करे और मरने के पश्चात् मोक्ष की प्राप्ति हो उसे वेद पढ़ना चाहिये, क्योंकि वेद की ही सहायता से वह इस संसार में सुख भोग सकता और मरने के पीछे मोक्ष प्राप्त कर सकता है। वेद ईश्वर वचन है। जिस प्रकार ईश्वर ने सृष्टि इसीलिये रची है कि इसकी सहायता से लोग अपने जीवन में सुख और उन्नति को प्राप्त करें और मरने के पीछे मोक्ष पावें उसी प्रकार ईश्वर ने वेद में वह विधान दिया है जिस से संसार की वस्तुओं का उत्तम प्रयोग करके जीवन में सुख और मृत्यु के पीछे मोक्ष मिल सके।
मनुष्य क्या चाहता है? दो ही बातें - सांसारिक सुख और मोक्ष। साधारण लोग केवल सांसारिक सुख चाहते हैं। परन्तु उनको भी अनिश्चित इच्छा होती है कि मरने के पश्चात् उनकी गति अच्छी हो। दुनिया के विषयों में अति आसक्त मनुष्य भी कभी कभी अपने मन में धर्म के विषय में यह विचार कर उठता है कि अच्छा होता अगर मेरा भविष्य भी अच्छा हो सकता। बुद्धिमान पुरुष तो केवल भविष्य को ही सोचता है और उसकी दृष्टि मरने के पीछे मोक्ष पद की प्राप्ति पर ही होती है। परन्तु उसको भी वर्त्तमान का ध्यान करना ही पड़ता है। सांसारिक उन्नति को कोई भी आंख ओझल नहीं कर सकता।
यहां देखना है कि सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति का वेदाध्ययन से क्या सम्बन्ध है।
सांसारिक उन्नति के तीन मुख्य अङ्ग हैं - (१) शरीर पुष्ट हो ! (२) खाने के लिये धन धान्य हो। (३) परिवार, सम्बन्धियों और जाति तथा देश वालों के साथ अच्छा व्यवहार हो।
इनको दूसरे शब्दों में कह सकते हैं स्वास्थ्य, अन्न और यश। यदि यह तीन वस्तुयें प्राप्त हों तो कोई यह नहीं कह सकता कि मेरे अभ्युदय अर्थात् सांसारिक सुख में कोई कमी है। देश देशान्तरों में इस समय जो प्रगतियां दिखाई पड़ती हैं उनका आधार यही तीन चीजें है। व्यापार, कला कौशल, तथा अस्त्र शस्त्र सभी इन तीन के साधन हैं।
प्रश्न यह है कि तीनों में क्या हानि होगी अगर वेद न पढ़े जाय। साधारणतया इस समय वही लोग बलिष्ट और धन सम्पन्न हैं जो वेद नहीं पढ़ते। जो पढ़ते हैं उनके पास आज इन तीनों में से एक भी पदार्थ नहीं। परन्तु इसका कारण भी वेदों के पढ़ने से ही अधिक ज्ञात हो सकता है।
स्वास्थ्य के लिये वेदों में सबसे अधिक बल ब्रह्मचर्य पर दिया गया है। जिस प्रकार वृक्ष के बढ़ने के लिये बीज मुख्य और अन्य सब वस्तुयें गौण है उसी प्रकार शरीर की पुष्टि के लिये भी वीर्य रक्षा मुख्य और सब बातें गौण हैं। समस्त वृक्ष बीज का ही विकसित रूप है। समस्त शरीर वीर्य का संवृद्ध रूप है। यदि बीज न हो तो खाद, पानी, प्रकाश, गर्मी कोई कारगर नहीं होती । दूषित और सड़ा गला बीज कोई वृक्ष उत्पन्न ही नहीं कर सकता। इसी प्रकार शुद्ध और वलिष्ठ वीर्य ही बलिष्ट शरीर को उत्पन्न कर सकता है। वेदों में वीर्य-रक्षा और ब्रह्मचर्य पर जितना बल दिया गया है उतना किसी अन्य धार्मिक या लोक व्यवहार की पुस्तक में नहीं है। अथर्व वेद के ग्यारहवें काण्ड का पांचवां सूक्त संपूर्ण ब्रह्मचर्य की महिमा का गान करता है। नीचे कुछ मंत्र दिय जाते हैं –
(१) ब्रह्मचारीष्णंश्चरति रोदसी उभे तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति। (अथर्व० ११-५-१) ब्रह्मचारी माता और पिता दोनों का अनुकरण करता हुआ विचरता है। उसमें सब विद्वान एक मत होते हैं।
(२) सर्वान्त्स देवांस्तपसा पिपर्ति। (अथर्व० ११-५-२) वह अपनी तपस्या के बल से सब विद्वानों के कार्यों की पूर्ति करता है।
(३) ब्रह्मचारी समिधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्ति। (अथर्व० ११-५-४) ब्रह्मचारी यज्ञ, ब्रह्मचर्य और परिश्रम रूपी तपोबल से संसार भर को पूर्ण कर देता है।
(४) इन्द्रो ह भूत्वासुरांस्ततर्ह। (अथर्व० ११-५-७) बलवान होकर दुष्टों का हनन करता है।
(५) ते रक्षति तपसा ब्रह्मचारी। (अथर्व० ११-५-८) ब्रह्मचारी दोनों लोकों की रक्षा करता है।
(६) ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति। (अथर्व० ११-५-१७) राजा ब्रह्मचर्य और तपोबल से ही राज की रक्षा कर सकता है।
(७) आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते। (अथर्व० ११-५-१७) आचार्य ब्रह्मचर्य की सहायता से ही इस योग्य होता है कि विद्यार्थियों को शिक्षा दे सकें।
(८) ब्रह्मचर्येण कन्या३ युवानं विन्दते पतिम्। (अथर्व० ११-५-१८) स्त्री ब्रह्मचर्य से ही विवाह करने के योग्य होती है।
(९) अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीर्षति। (अथर्व० ११-५-१८) ब्रह्मचर्य से ही बैल और घोड़े अपने अन्न को पचा सकते हैं।
(१०) ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत। (अथर्व० ११-५-१९) ब्रह्मचर्य से ही विद्वान् मौत के दु:ख का सामना कर सकते हैं।
जितना महत्त्व ब्रह्मचर्य का इस सूक्त में वर्णन है उतना किसी अन्य स्थान पर नहीं। काम का जीवन और आराम की मृत्यु (Useful life and peaceful death) यही सब मनुष्यों का उद्देश होना चाहिये और इन दोनों का वेदों ने ब्रह्मचर्य ही साधन बताया है। जब वेदों का पठन पाठन होता था उस समय लोग ब्रह्मचर्य की महिमा को समझते थे। उसी समय भारतवासी उन सब वस्तुओं से सम्पन्न थे जो जीवन यात्रा के लिये आवश्यक हैं। जब से वेदों का पठन पाठन छूटा उसी समय से ब्रह्मचर्य भी लुप्तप्राय हो गया और तभी से भारतवासियों का जीवन दु:खमय हो गया। आज भारतवासी केवल नाम के वेदानुयायी हैं और ब्रह्मचर्य शब्द भी नाम मात्र ही रह गया है ! इस लिये इनको वेदानुयायी होने से कोई लाभ नहीं रहा। यह कभी कभी वेदों का नाम तो लेते हैं परन्तु उनकी शिक्षा को सर्वथा भूले हुये हैं। इसलिये उनको अनेक कष्ट पहुंच रहे हैं। दूसरे देश के लोग वेदों को न मानते हुये भी कुछ कुछ ब्रह्मचर्य पालन करते हैं इसलिये उनके देश हरे भरे हैं। परन्तु वेदों के न मानने से उनमें एक कमी हैं । वह ब्रह्मचर्य के अधूरे और कुछ कुछ भौतिक अंश का ही पालन करते हैं इसलिये उनका जीत्रन कुछ कुछ कामकर (Useful) अवश्य होता है परन्तु मृत्यु आराम की (Peaceful death) नहीं होती। दुःख रहित मृत्यु के लिये ब्रह्मचर्य का आध्यात्मिक अंश चाहिये। जिस प्रकार से घोड़ा और बैल ब्रह्मचर्य के बल से अन्न कमा सकते और पचा सकते हैं उसी प्रकार ये देश भी ब्रह्मचर्य के बल से अन्न आदिक भौतिक सुखों की सामग्री का सम्पादन कर सकते हैं। परन्तु उनको ब्रह्मचर्य की आध्यात्मिक महिमा का पता नहीं। इसलिये वह देवों के समान मृत्यु का सामना नहीं कर सकते। यदि इन देशों में वेद का प्रचार हो जाय तो यह देश इस त्रुटि को भी पूर्ण कर लेंगे और यदि हमारे देश में वेद के नाम लेने के बजाय वेद की शिक्षा पर पूर्ण रीति से व्यवहार होने लगे तो हम लोग अपने लौकिक उत्थान में सफल हो सकेंगें। (क्रमशः)
[स्रोत : ‘वेदोदय’ मासिक, माघ-1987, फरवरी-1931, भाग-2, संख्या 5, पृष्ठ 178-181, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]