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ARYA SAMAJ AJMER

कृण्वन्तो विश्वं आर्यम्

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Our Legacy

आर्य समाज
अशोक विहार के संस्थापक

संस्थापक—— "आर्य समाज" अशोक विहार अजमेर की स्थापना श्री आदित्य मुनि/ वीएस गहलोत ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 2079- दिनांक 2 अप्रैल 2022 को स्वयं के मकान में करी थी। वर्तमान में आप ऋषि उद्यान में ईश्वर के संदेश के तहत सपत्नीक निवास कर रहे हैं।तथा उनके पौराणिक से सनातन वैदिक धर्मी बनने की कहानी उनके ही शब्दों में संक्षेप में निम्नानुसार है । यह की अगस्त 1997मे, गांधीधाम में रेलवे सर्विस के दौरान मुझे रात्रि को स्वप्न आया कि अपने एक चाचा जी स्वर्गीय रामलाल प्रजापति जी के साथ अजमेर में घरेलू सामान खरीदने के पश्चात मेंने उनसे कहा कि अब मैं अपना सामान सिटी बस में रख देता हूं और आप घर जाइए और मैं वेद पढ़ने जा रहा हूं, तब चाचा जी ने कहा कि हां बेटा जाओ और मेरे अजमेर में एक स्थान पर वेद पढ़ने हेतु प्रवेश करने के पश्चात मेरा स्वप्न टूट गया था। अतः प्रातःकाल उठने के पश्चात स्वप्न के बारे में विचार करने लगा कि वेद कैसे होते हैं कभी देखा या सुना नहीं था तथा कहां पढ़ने को मिलेंगे आदी आदी। तभी अक्टूबर के महीने में बाजार में आर्य समाज गांधीधाम के वार्षिक उत्सव के पोस्टर लगे हुए थे तथा उसके चारों कोनों पर चारों वेद के नाम लिखे हुए थे अतः उसे पढ़कर में निश्चित तिथि को वार्षिक उत्सव में गया वहां बैठकर प्रवचन सुनने के दौरान मेरे दिमाग में एक तीव्र हलचल हुई और तुरंत ही मुझे ऐसा महसूस कि अरे मैं तो इसी वैदिक संस्कृति का सिपाही हूं और तीन दिन तक उस उत्सव में भाग लेकर आनंदित होता रहा और फिर उत्सव के बाद नित्य प्रति आर्य समाज में जाने लगा तथा मेरी जिज्ञासा, शंका, समाधान आदि के बारे में वहां के मंत्री श्री वाचोनिधि जी से चर्चा करने लगा, इस तरह में पूर्णतया वैदिक धर्मी बन गया था। अब मेरे मन में स्वप्न में जो स्थान अजमेर में वेद पढ़ने हेतु आया था उसे ढूंढने का विचार चल रहा था अतः कुछ समय बाद जब अजमेर आया तब आर्य समाज केसरगंज तथा परोपकारिणी सभा गया वहां से मुझे ऋषि उद्यान का पता चला तो मैं ऋषि उद्यान आया यहां आते ही मुझे स्वप्न में जो स्थान दिखा था वह आज मुझे मिल गया था। अतः में अत्यंत प्रसन्न हुआ और जब भी अजमेर आता था तो यहां पर ही ठहरकर यहां के प्रत्येक कार्यक्रम में भाग लेता रहता था। फिर कुछ समय बाद मेरा स्थानांतर अचानक आबू रोड हो गया बिना किसी कारण के अतः यहां आना पड़ा तथा यहां के आर्य समाज से जुड़कर अपना कार्य करने लगा, उस समय वहां स्व. जेठमल जी मंत्री हुआ करते थे। फिर मेरा स्थानांतर मार्च 2007 में अचानक अजमेर हो गया अतः मुझे मजबूरी में आना पड़ा तथा मेरी पत्नी और पुत्र भी यहां आकर प्रसन्न नहीं थे लेकिन हम सब मजबूर थे, अतः धीरे-धीरे हम सब यहां के वातावरण में घुल मिल गये। फिर अचानक मेरे पुत्र की मृत्यु दिनांक 12 जनवरी 2008 को एक साज़िश के तहत हो गई थी। अतः उसका अंतिम संस्कार वैदिक विधि से महर्षि दयानंद के अंतिम संस्कार स्थल के पास ही संपन्न हुआ था। फिर मैं पुत्र की स्मृति में ऋषि उद्यान में दान देने आया था तब स्व. डॉक्टर धर्मवीर जी को एक लाख रुपए एक कक्ष तथा एक लाख रुपए हमारे नाम से दूसरे कक्ष निर्माण हेतु दान दिया था। बाद में मुझे मालूम पड़ा की जिन कक्षों के लिए मैंने दान दिया है उसमें हम आजीवन रह भी सकते हैं। फिर कुछ दिनों पश्चात मेरी पत्नी मुझसे आए दिन झगड़ने लगी अतः इससे परेशान होकर मैंने ऋषि उद्यान में ही रहने का मन बनाया तथा अप्रैल 2010 में सेवानिवृत्ति के दो महीने पहले की स्वामी विश्वंड जी की स्वीकृति से ओमानंद भवन में कक्ष क्रमांक 13 में सपत्नीक आकर रहने लगा था, उस समय यहां बहुत से दंपति, पुरुष और महिलाएं रहते थे अत यहां आकर पत्नी के झगड़ों से धीरे-धीरे मुक्ति मिल गई थी। फिर यहां आने के पश्चात अगस्त 1997 से अप्रैल 2010 तक के 13 वर्षों के सफर के बारे में चिंतन करने लगा तब मुझे धीरे-धीरे समझ में आया कि मुझे अगस्त 97 में स्वप्न के माध्यम से जो ईश्वरीय संदेश ऋषि उद्यान में वेद पढ़ने जाने का हुआ था, लेकिन इसका अभिप्राय में समझ नहीं सका था अतः मेरा गांधीधाम से आबू रोड फिर आबू रोड से अजमेर अचानक स्थानांतरण हो जाना फिर यहां एक वर्ष पश्चात पुत्र की मृत्यु हो जाना फिर उसकी स्मृति में ऋषि उद्यान में कक्ष निर्माण हेतु दान देना तत्पश्चात मेरी पत्नी के नित्य प्रति झगड़ा करते रहने से मुझे अपने निजी आवास में ना रहते हुए यहां रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। अतः अब मैं ईश्वरीय सत्ता एवं उनके अभिप्राय को समझते हुए चुपचाप स्वप्न के अनुसार यहां रह कर वेद पढ़ रहा हूं और उसकी लिला को समझने का प्रयत्न कर रहा हूं। इसी के तहत ऋषि उद्यान में रहते हुए अब दूसरों को भी वेद पढ़ाने हेतु मार्च 2013 से अपने मित्रों के साथ केरल में आर्य समाज एवं गुरुकुलों के स्थापना करके सनातन वैदिक संस्कृति के अध्ययन एवं संरक्षण का कार्य भी कर रहा हूं, अस्तु।

Founder's Vision

"Truth is the path that leads to the Divine."

Our Mission & Values

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वैदिक शिक्षा

आर्य समाज अशोक विहार का मूल आधार वैदिक शिक्षा है। संस्था का उद्देश्य वेदों के सत्य ज्ञान का प्रचार-प्रसार कर व्यक्ति और समाज को अज्ञान, अंधविश्वास एवं कुरीतियों से मुक्त करना है। वैदिक शिक्षा के प्रमुख आयाम: वेदाध्ययन एवं स्वाध्याय — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के मूल मंत्रों का अध्ययन और अर्थ-चिंतन। संस्कृत एवं व्याकरण प्रशिक्षण — शुद्ध उच्चारण और अर्थबोध के लिए भाषा का ज्ञान। नैतिक एवं चरित्र निर्माण — सत्य, अहिंसा, संयम और कर्तव्यपरायणता का विकास। यज्ञ-प्रशिक्षण — वैदिक विधि से यज्ञ करने एवं कराने का अभ्यास। तर्क एवं विवेक — प्रमाण, युक्ति और विचार के आधार पर सत्य का ग्रहण। संस्था का विश्वास है कि वैदिक शिक्षा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को वैज्ञानिक, नैतिक and अनुशासित बनाने की संपूर्ण पद्धति है। वेद-आधारित ज्ञान ही व्यक्ति को आत्मनिर्भर, सत्यनिष्ठ and समाजोपयोगी बनाता है।

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सामाजिक सेवा

आर्य समाज अशोक विहार सामाजिक सेवा को वैदिक कर्तव्य मानता है। संस्था का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक उन्नति ही नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग का नैतिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक उत्थान भी है। सामाजिक सेवा के प्रमुख कार्य: वैदिक शिक्षा एवं नैतिक प्रशिक्षण — बच्चों और युवाओं में संस्कार, चरित्र और अनुशासन का विकास। नशा-मुक्ति एवं कुरीति उन्मूलन अभियान — समाज को व्यसन और अंधविश्वास से मुक्त करने का प्रयास। संस्कार एवं यज्ञ आयोजन — वैदिक विधि से विवाह, नामकरण, यज्ञादि कार्यक्रम। साहित्य वितरण एवं ज्ञान-प्रचार — सत्यार्थ एवं वैदिक ग्रंथों का प्रसार। आवश्यकतानुसार सहयोग — समाज के जरूरतमंद व्यक्तियों की सहायता। संस्था का विश्वास है कि सच्ची सामाजिक सेवा वही है, जो व्यक्ति में आत्मबल, नैतिकता और सत्यनिष्ठा का विकास करे। वैदिक सिद्धांतों पर आधारित सेवा ही स्थायी और कल्याणकारी समाज का निर्माण कर सकती है।

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आध्यात्मिक विकास

आर्य समाज अशोक विहार का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति और समाज का आध्यात्मिक उत्थान है। आध्यात्मिक विकास का अर्थ है—वेदाधारित ज्ञान के माध्यम से आत्मा की उन्नति, सत्य के प्रति निष्ठा, और जीवन में सदाचार की स्थापना। आध्यात्मिक विकास के प्रमुख आधार: वेदाध्ययन एवं स्वाध्याय — सत्य ज्ञान की प्राप्ति और अज्ञान का निवारण। यज्ञ एवं उपासना — ईश्वर के प्रति कृतज्ञता, अनुशासन और आत्मशुद्धि। संस्कार व्यवस्था — जीवन को शुद्ध, संयमित और उद्देश्यपूर्ण बनाना। सत्याचरण — विचार, वचन और कर्म में पवित्रता। सेवा-भाव — समाज हित में कार्य कर आत्मोन्नति करना। जब व्यक्ति अपने जीवन को वेद के सिद्धांतों पर स्थापित करता है, तब उसका मन, बुद्धि और आचरण शुद्ध होते हैं। यही वास्तविक आध्यात्मिक विकास है, जो व्यक्तिगत शांति के साथ-साथ सामाजिक समरसता और नैतिक शक्ति को भी सुदृढ़ करता है।

Governing Body

The dedicated leaders guiding our spiritual journey

आदित्य मुनि जी ( वीएस गेहलोत)

अध्यक्ष

आदित्य मुनि जी (वीएस गेहलोत) एक समर्पित वैदिक साधक, विचारक एवं समाजसेवी हैं। आप वर्तमान में आर्य समाज अशोक विहार के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। आपका जीवन वेदों के अध्ययन, मनन और वैदिक सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार को समर्पित रहा है। आपके नेतृत्व में आर्य समाज अशोक विहार यज्ञ, संस्कार, वैदिक शिक्षा तथा सामाजिक सुधार के कार्यों को निरंतर आगे बढ़ा रहा है। संगठनात्मक अनुशासन, सरल जीवन और सेवा-भाव आपके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ हैं। वैदिक संस्कृति के संरक्षण एवं जन-जागरण के लिए आपका योगदान प्रेरणास्पद है।

आर्य नन्द किशोर जांगिड

मंत्री

आर्य नन्द किशोर जांगिड जी एक निष्ठावान वैदिक विचारक, समाजसेवी एवं संगठनकर्ता हैं। आप ऋषि मिशन ट्रस्ट के संस्थापक हैं तथा वर्तमान में आर्य समाज अशोक विहार के मंत्री पद पर दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। आपका जीवन वेद-प्रमाणित आर्य सिद्धांतों, नैतिक शिक्षा, यज्ञ, संस्कार एवं समाज-सुधार के कार्यों को समर्पित है। संगठनात्मक क्षमता, अनुशासन और सेवा-भाव के माध्यम से आप आर्य समाज के उद्देश्यों—वेदों का प्रचार, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन और वैदिक संस्कृति का संरक्षण—को प्रभावी रूप से आगे बढ़ा रहे हैं। आर्य नन्द किशोर जांगिड जी के मार्गदर्शन में आर्य समाज अशोक विहार निरंतर वैदिक शिक्षा, संस्कार-प्रशिक्षण एवं समाजोपयोगी गतिविधियों के माध्यम से जन-कल्याण के कार्यों में सक्रिय है।

श्रीमती कंचन गेहलोत

कोषाध्यक्ष

श्रीमती कंचन गेहलोत जी आर्य समाज अशोक विहार में कोषाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। आप संस्था की आर्थिक व्यवस्थाओं के सुव्यवस्थित संचालन, पारदर्शिता एवं अनुशासनपूर्ण लेखा-प्रबंधन का दायित्व निष्ठा और ईमानदारी से निभा रही हैं। वैदिक सिद्धांतों के अनुरूप समाज-सेवा और संगठन की गतिविधियों को सुदृढ़ बनाने में आपका योगदान सराहनीय है।