95 वर्ष पुराना एक दुर्लभ एवं महत्त्वपूर्ण लेख...
• वेदों की संसार के लिये आवश्यकता • (गतांक से आगे – दूसरी क़िस्त)
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-- पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय
इस समय भी यूरोप में वेदाध्ययन के विषय में कुछ न कुछ परिश्रम होता ही रहता है। यूरोप की अन्वेषण शक्ति बहुत बढ़ी चढ़ी है। उनके पास खाने को है, उनके पास शक्ति है, उनके पास यश है, इन सबसे अधिक उनकी जनता उनका धन धान्य से सम्मान करती है। इसलिये यूरोप के विद्वान विदेशीय भाषाओं, विदेशीय धर्म और विदेशीय प्रथाओं के अध्ययन में निरन्तर श्रम करते रहते हैं। भारतीय धर्मों के अध्ययन करने वाले भी कुछ कम नहीं है। एक जैन धर्म का विशेषज्ञ है तो दूसरा बौद्ध धर्म का। तीसरा किसी अन्य का। फिर इसके अतिरिक्त एक एक शाखा के बहुत से विशेषज्ञ हैं। यह एक एक पुस्तक की कई कई प्रतियां इकट्ठी करते उनका [मिलान] करते, उनके पदों और अक्षरों को [मिलाते] और अन्त में इतनी सामग्री इकट्ठी कर देते हैं कि उस धर्म के मानने भी चकित हो जाते हैं और उनको अपना धर्म गुरू मान बैठते हैं। वेदों की [बड़ाई] के विषय में आजकल भारतीय प्लेटफोर्म से जो व्याख्यान दिये जाते हैं या भारतीय पुस्तकों और पत्रों में जो लेख लिखे जाते हैं उनमें अधिकतर यूरोपीय गुरुओं ही महिमा गाई जाती है। जिस समय एक जर्मन या फ्रेंच वेदज्ञ का नाम लेकर व्याख्यान-दाता गर्जता है तो जनता में एक विशेष उत्साह आ जाता है। “जब जर्मन प्रोफसर ने वेद के विषय में एक दो मंगल सूचक शब्द कह दिये तो वेद अवश्य ही आदरणीय होंगे।" - यह दृष्टिकोण एक बात को अवगत करता है अर्थात् यूरोपियन लोगों ने हमारी पुस्तकों के अध्ययन और उनकी थोड़ी बहुत प्रशंसा से हमारे मस्तिष्कों पर अधिकार जमा लिया। और अब हम सर्वथा उनकी उंगली पर नाचते हैं। यह सबसे अधिक पुरस्कार था जो यूरोप के लोगों को वेदाध्ययन के लिये मिल सकता था, परंतु इसका हमारे ऊपर क्या प्रभाव पड़ा? हममें वेदाध्ययन के लिये उत्साह नहीं बढ़ा। हम वेदों की प्रशंसा करने के स्थान में वेदों की प्रशंसा करनेवाले के प्रशंसक बन गये। जो लोग बाह्य विद्वानों के वेद विषयक वचन सुन जाते हैं वह घर को केवल इतना ही ले जाते हैं कि वेद बड़ी अच्छी पुस्तक हैं। परन्तु वह घर जाकर उनको पढ़ते नहीं। प्रशंसा हो गई। हमारा धर्म उच्च सिद्ध हो गया। हम बड़े कहलाये गये बस। और क्या चाहिये।
बड़े बड़े पण्डितों को देखिये। क्या वह वेद पढ़ते हैं? उनके व्याख्यान सुनिये क्या वह वेद वाक्य सुनाते हैं? कुछ गीता कुछ पुराण कुछ महाभारत। बस ! उनके मस्तिष्क में ही नहीं आता कि वेदाध्ययन की संसार को आवश्यकता है। एक मुसलमान का यह विश्वास है कि संसार के लिये कुरान की सब से अधिक आवश्यकता है। इस लिये वह अपने बच्चों को सब से पहले कुरान पढ़ाता है। भारतीय मुसलमानों ने इसके लिये सुगम से सुगम मार्ग निकाले हैं। बाजार में एक “क़ायदा” नाम की छोटी सी पुस्तिका बिकती है जिसमें उर्दू की वर्णमाला रहती हैं कि एक बच्चा इस क़ायदें को पढ़कर ही पंद्रह दिन में कुरान आरम्भ कर सकता है। तात्पर्य यह है कि एक मुसलमान बच्चे के लिये कुरान का पढ़ना चिट्ठी पढ़ने की अपेक्षा अधिक आवश्यक है। ईसाइयों में भी अपनी धर्म पुस्तक पहले पढ़ाई जाती है। ईसाई मंदिरों में बाइबिल के बचन सुनाये जाते हैं। बहुधा देवियां अपने बच्चों को लेकर वहां जाती हैं और उन वचनों को बच्चों को याद कराती हैं। क्या हिन्दुओं में इस प्रकार की कोई प्रथा है? मुझे इस विषय में एक कहानी याद है। कई वर्ष हुये वेदों की कुछ प्रशंसा पत्रों में की गई। एक भारतीय कालिज के प्रोफ़सर को यह सूझा कि वेदों का गुटका अपने प्रेस में निकालें। वह मेरे पास दौड़े आये। और लगे हिसाब करने। उन विचारे को न मालूम था कि वेद किस प्रकार के और कितने बड़े हैं। उन्होंने वेदों का केवल नाम पढ़ा था। जब मैंने चारों वेद उनके सामने रक्खे तो उनके छक्के छूट गये। उस दिन से मैंने उन्हें कभी वेदों के विषय में बातचीत करते नहीं सुना। यह वह प्रोफसर हैं जिनमें भारतीयता का अंश बहुत अधिक है और स्वदेशी के बड़े प्रेमी हैं। अन्य क्या होंगे इसका कहना ही कठिन है। (क्रमशः)
[स्रोत : ‘वेदोदय’ मासिक, अगहन (मार्गशीर्ष)-1987, दिसम्बर-1930, भाग-2, संख्या 3, पृष्ठ 88-89, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]
Special Edition
The Arya Chronicle
Vol. 2026 — No. 6
vedon ki sansaar ke liye aavshyakta bhaag 2
Ajmer, Friday, February 20, 2026
वेदों की संसार के लिये आवश्यकता (गतांक से आगे – दूसरी क़िस्त)
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