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Special Edition The Arya Chronicle Vol. 2026 — No. 5

vedon ki sansaar ke liye aavshyakta bhaag 1

Ajmer, Thursday, February 19, 2026

वेदों की संसार के लिये आवश्यकता भाग १

95 वर्ष पुराना एक दुर्लभ एवं महत्त्वपूर्ण लेख...
• वेदों की संसार के लिये आवश्यकता •

-पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय 
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम्। 
अविप्लुत ब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशत्॥
यह मनुस्मृति के तीसरे अध्याय का दूसरा श्लोक है। इसमें गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिये दो शर्तें रक्खी गई हैं। एक तो ब्रह्मचर्य्य की और दूसरी वेदाध्ययन की। इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार चाल चलन का बिगड़ा हुआ पुरुष गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट नहीं हो सकता क्योंकि इससे उसकी सन्तान की भ्रष्ट होने की आशङ्का है, इसी प्रकार सुखी जीवन व्यतीत करने के लिये वेद पढ़ने की आवश्यकता है।
वेद पढ़ने के विषय में तीन नियम हैं। जो सम्पूर्ण चारों वेद पढ़ा हो वह सबसे उत्कृष्ट है। परन्तु चार न सही दो ही सही। कम से कम एक अवश्य ही पढ़ा होना चाहिये।
आजकल यदि विवाह के लिये यह नियम रख दिया जाय तो संसार भर में तो क्या, वेद की राजधानी भारतवर्ष में भी तीस करोड़ में तीस स्त्री-पुरुष भी विवाह के योग्य नहीं पाये जा सकेंगे। परन्तु जिस समय भाषा तथा प्रथाओं के कारण वेद का पढ़ना सुगम होगा और पूर्ण युवावस्था में विवाह होता होगा, उस समय यह बात आश्चर्यजनक न रही होगी। यदि वेदों का पढ़ना असम्भव या अनावश्यक होता तो मनुस्मृति में विवाह के लिये यह शर्त कदापि न दी गई होती । आजकल इस प्रकार की शर्तें कैसी अजीब प्रतीत होती हैं। किसी युवा पुरुष या युवती स्त्री से कहा जाय कि तुम्हारा विवाह हो ही नहीं सकता और तुम गृहस्थ कहलाये ही नहीं जा सकते जब तक वेदों को या कम से कम एक वेद को समाप्त न कर लो, तो यह बड़े आश्चर्य की बात प्रतीत होगी। वह युवा या युवती हँसेगें कि "वाह ! अच्छी रही ! यह भी कोई शर्त है? क्या वेद पढ़ना ऐसा सुगम है कि हम चार-छः मास में इनको पढ़ डालें ? फिर यदि इनका पढ़ना सम्भव भी हो इससे लाभ क्या? आखिर इतना परिश्रम ही क्यों किया जाय। वेद पढने से हमारा क्या हित होगा?" मनु के प्रमाण को कौन मानता है? प्राचीन काल के आर्यों की धुन रही होगी कि "वेद पढो ! वेद पढो।" आजकल नई रोशनी के युग में वेदों की क्या आवश्यकता?
आजकल वेद क्यों पढे जाते हैं। भारतवर्ष में तो वेद  पढ़ने की प्रथा ही नहीं है। कुछ लोग दो-चार मन्त्रों को यह समझ कर पढ़ लेते हैं कि यह धार्मिक पुस्तक हैं और इनसे कुछ अज्ञात पुण्य होता होगा। ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत कम है। कुछ पंडित वेदों का गान करते हैं वह भी इस विचार से नहीं कि उनका पढ़ना जीवन यात्रा के लिये हितकर या आवश्यक है किन्तु इसलिये कि वह इसे धार्मिक कृत्य समझते हैं। जिस प्रकार कुरान का हाफ़िज समझता है कि कुरान के पठन मात्र से उसके स्वर्गारोहण में सुगमता हो जायगी या गुरु-ग्रन्थ साहब पर फूल चढ़ानेवाला सिक्ख समझता है कि मैं कुछ पुण्य कमा रहा हूं इसी प्रकार वेदाध्ययन करनेवाले भी समझते हैं। भारतवर्ष से बाहर पश्चिमी देशों में वेदों का अध्ययन अधिक नियम अनुसार होता है और यूरोप के पूर्वीय ग्रन्थों के अध्ययन करनेवाले जिनको अंगरेजी में ओरियण्टलिस्ट (Orientalists) कहते हैं बड़े परिश्रम से वेदों की छानबीन करते हैं। परन्तु अब तो जो कुछ वेदों का अध्ययन पश्चिम में हुआ है, उसकी तह में दो बातें हैं। एक तो भारत पर आधिपत्य रखने की लालसा, दूसरे ईसाई धर्म के प्रचार की चेष्टा। जब ईसाई पादरियों भारत पर आक्रमण करना आरम्भ किया तो उन्हें यह जानने की आवश्यकता पड़ी कि जिनको वह ईसाई बनाना चाहते हैं उनके धार्मिक विचारों से अभिज्ञता प्राप्त की जाय। यह यत्न कई सौ वर्षों से होता रहा। इन पादरियों का यह तो दृढ़ विश्नाम था कि बाइबिल से उत्कृष्ट पुस्तक संसार में हो नहीं सकता। देखना केवल इतना था कि वेद बाइबिल से कितने नीचे हैं और वेदानुयायियों से किस प्रकार सुगमता से समझाकर ईसाई बनाया जा सकता हैं। मैक्समूलर आदि ने कई स्थानों पर बाइबिल और उपनिषदों की तुलना की है और यही उपनिषदों की बहुत प्रशंसा की है तथापि अन्तिम सिद्धान्त यही निकाला है कि बाइबिल की शिक्षा अधिक उत्कृष्ट है। उनका सबसे बड़ा यत्न यह रहा है कि जिस प्रकार हो सके भारतीयों के वेद सम्बन्धी दृष्टिकोण को बदल दिया जाए। भारतीयों का दृष्टिकोण वेद के विषय में क्या था?

यही कि वेद ईश्वर कृत पवित्र धार्मिक पुस्तकें हैं। जिन्होंने कभी वेद का अक्षर भी नहीं पढ़ा वह भी वेद के नाम से प्रभावित हो जाते हैं। बहुत से भारतीय वेद को इतना उच्च समझते हैं कि वह अपनी अपवित्रता अयोग्यता का अनुभव करके वेद को छूना भी पाप समझते हैं। उनका विचार है कि केवल बहुत पवित्र पुरुष ही वेदों को पढ़ने का अधिकारी है। शायद वेदों की इस अनिर्वचनीय और अमीमांसनीय पवित्रता के कारण ही इन्होंने स्त्रियों और शूद्रों को वेद पढ़ने से वर्जित कर दिया होगा। जब तक भारतीयों के मस्तिष्क में वेदों का इतना मान रहेगा उस समय तक उनका ईसाइयत को स्त्रीकार करना कठिन है। भारतीय लोग ऐसे तो थे नहीं जैसे लुप्त प्राय अमेरिका के इनका लोग। इनका लोगों के पास एक पादरी गया और उनके सरदार को एक बाइबिल देकर कहा, "जो यह पुस्तक कहे उसको मानो।" इनका जाति के सरदार ने बाइबिल को कान पर रक्खा। उसे कोई शब्द सुनाई न पड़ा इसलिये उसने बाइबिल को फेंक कर कहा, "वह तो कुछ नहीं कहती।" पादरी को अवसर मिल गया। उसने युद्ध छेड़ दिया क्योंकि इनका सरदार ने उसकी धार्मिक पुस्तक का अपमान किया। यह तरकीब अमेरिका की जंगली जातियों के लिये उपयुक्त हो सकती थी। परन्तु भारतीय अधिक सभ्य थे। उनके पास उत्कृष्ट भाषा थी। यद्यपि यह अपने आलस्य और प्रमाद के कारण अपनी साहित्य रूपी अपूर्व पूंजी से अनभिज्ञ हो चले थे तो भी बहुत कुछ शेष था। इसलिये इनको ईसाई बनाने के लिये यह उपाय सोचा गया कि वेदों का दूसरी प्रथा से अध्यापन किया जाय। इसमें कृतकार्यता भी बहुत हुई। जो बात मुसलमानी समय की तलवार न कर सकी वह आधुनिक यूनीवर्सिटियों और यूरोप के ओरियण्टलिस्टों ने कर दिखाई। अब भारत के नई प्रथा से पढ़े हुये संस्कृतज्ञों का दृष्टिकोण वेद के विषय में वह नहीं रहा। मैक्समूलर ने ‘सेक्रीड बुक्स आफ दी ईस्ट’ (Sacred Books of the East) नामी जो एक उत्कृष्ट ग्रन्थमाला निकाली उसके कुछ लेखक भारतीय विद्वान् भी थे। परन्तु उनके लेखों के देखने से ज्ञात होता है कि उनके विचार अपने धार्मिक ग्रन्थों के विषय में वही थे जो यूरोपवालों के थे। लोकमान्य तिलक एक बहुत ही आदरणीय और उत्कृष्ट भारतीय थे। उनकी रगों में भारतीयता के लिये जोश था। वह स्वराज्य को भारतीयों का जन्म सिद्ध अधिकार समझते थे। वह संस्कृत और अंगरेजी दोनों के धुरन्धर पण्डित थे। परन्तु उन्होंने वेदों के विषय में जो कुछ लिखा उसकी शैली यूरोपियन शैली थी।
भारत पर आधिपत्य की लालसा ने भी वेदों के अध्ययन में बड़ी उत्तेजना उत्पन्न की। वही शासक हो सकता है जो शास्य जाति के मस्तिष्क को समझता हो। भारतीय मस्तिष्क के समझने के लिये वेदों का समझना अत्यावश्यक था। इसीलिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत का शासक होते ही बहुत सा रुपया वेदों के लिये व्यय किया।
‘इण्डिया ह्वाट कैन इट टीच अस’ (India, what can it teach us) नामी पुस्तक जो मैक्समूलर ने लिखी उसमें यद्यपि भारतवर्ष की भूरि भूरि प्रशंसा की गई है, परन्तु उसका मुख्य प्रयोजन यह था कि सिविल सर्विस में शामिल होनेवाले अंगरेज विद्यार्थियों को भारत में आने और भारतीयों पर शासन करने के लिये उत्तेजित किया। अङ्गरेज युवकों को घर छोड़कर सहस्रों मील दूर भारत में आने के प्रलोभनों की आवश्यकता थी। इसलिए मैक्समूलर को चुना गया कि वह सिविल  सर्विस के छात्रों को भारतीय सभ्यता विषय में व्याख्यान दें। (क्रमशः)
[स्रोत : ‘वेदोदय’ मासिक, कार्तिक-1987, नवम्बर-1930, संख्या 2, पृष्ठ 45-48, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]

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