• स्वामी विवेकानन्द का मूर्तिपूजा विषयक हेत्वाभास एवं भ्रान्ति •
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• युक्ति :
एक बार राजा (अलवर नरेश) ने स्वामी विवेकानन्द जी से कहा कि मूर्तिपूजा पर मेरा विश्वास नहीं होता। राजा की यह बात सुनकर स्वामी विवेकानन्द दीवार पर से महाराज का चित्र उतार कर दीवान से बोले, “यह किसका चित्र है ?" दीवान ने कहा, "यह महाराज साहब का फोटो है"। जो लोग वहां मौजूद थे उन लोगों से स्वामी जी ने फोटो पर थूकने के लिए कहा। लेकिन किसी ने भी वैसा करने का साहस न किया। विस्मय व डर के मारे सभी घबरा उठे। तब स्वामी जी बोले, “चित्र में तो महाराजा साहब नहीं हैं, तो भी इस पर कोई थूकने की हिम्मत नहीं करता। इसका एक मात्र कारण यही है कि सब लोग यह सोचते हैं कि ऐसा करने से जिसका यह चित्र है उसका अपमान होगा। मूर्तिपूजा में भी ऐसा ही है। कोई ईट पत्थर या काठ की पूजा नहीं करता, बल्कि अपने इष्ट देव के अनुकूल मूर्ति बनाकर पूजता है। उसी मूर्ति में वह अपने इष्ट देव की छाया देख पाते है, ईंट पत्थर को नहीं देखते। जो मूर्तिपूजा करते हैं वे क्या कभी यह कहते हैं, "हे ईंट, हे पत्थर, हे काठ! मैं तुम्हारी पूजा करता हूं, तुम मुझ पर दया करो।" स्वामी जी का यह उत्तर सुन कर महाराजा साहब बोले, "आपने मेरे हृदय के अन्धकार को दूर कर दिया मेरी आंखें खोल दी।"
• समाधान :
स्वामी विवेकानन्द जैसे जगत् प्रसिद्ध विद्वान् ने वाक्छल का आश्रय लिया है। प्रश्न कुछ है, उत्तर कुछ और है। किसी के चित्र अथवा मूर्ति का जान बूझकर अपमान करना निश्चय उसका, जिसकी वह मूर्ति है, अपमान है। वैसे नित्य समाचार पत्रों में प्रकाशित [चित्र, फोटो आदि] रद्दी में पड़कर जाने, अनजाने सभी प्रकार के कार्यों में आते रहते हैं, परन्तु यहां प्रश्न मूर्तिपूजा का है, मूर्तिभंजन या उसे अपवित्र करने का नहीं है। किन्तु जो परमात्मा निराकार और अमूर्त है उसका कोई चित्र या मूर्ति नहीं जिसे अपवित्र या अपमानित किया जा सके। यह ठीक है कि वह सर्वव्यापक होने से प्रत्येक वस्तु में व्याप्त है, परन्तु इससे वह वस्तु परमात्मा तो नहीं हो जाती। यदि ऐसा मान लिया जाये, तो ईंट, पत्थर, पृथ्वी, जिन्हें हम नित्य मल-मूत्र से अपवित्र करते रहते हैं, क्या उससे परमात्मा अपवित्र हो जाता है? प्रश्न सीधा यह है कि क्या यह मूर्तियां, जिनकी लोग पूजा करते हैं परमात्मा की हैं? यदि नहीं, तो वह ईश्वर-पूजा कैसे हुई? जिस जिसकी वह मूर्ति है उसकी पूजा तो एक क्षण को आप कह सकते है, परन्तु ईश्वर की नहीं। परन्तु किसी महापुरुष की पूजा उसकी शिक्षा और उपदेशों का अनुकरण हो सकता है। उसे जीवितों की भांति स्नान कराना, भोग लगाना, हाथ जोड़ना नहीं। मूर्तिपूजा, ईश्वर प्राप्ति का साधन नहीं, इसे हम अन्यत्र सिद्ध कर चुके हैं, अतएव उस पर पुनः कुछ लिखना पिष्ट-पेषण होगा। पाठक उसे वहां देख लें। (लेखक की पुस्तक 'भारत में मूर्तिपूजा में।)
एक मूर्ति-पूजक मूर्ति को ही ईश्वर समझ कर उसकी पूजा करता है, उसमें व्यापक ईश्वर की नहीं, क्योंकि जब तक उस मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा नहीं होती वह उसे पाषाण की भांति जड़ वस्तु ही समझता है। प्राण प्रतिष्ठा होने पर उसकी पूजा का प्रकार यह सिद्ध करता है कि वह उस मूर्ति की ही पूजा करता है, ईश्वर की नहीं, अन्यथा सर्वव्यापक परमात्मा तो उस मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा से पूर्व भी व्याप्त था। यदि मूर्तिपूजा में मूर्ति व्याप्त ईश्वर की पूजा है तो उसकी स्नान, चन्दन-लेपन, भोग, दीप आदि से अर्चना का कोई अर्थ नहीं, क्योंकि ईश्वर को तो इन वस्तुओं की आवश्यकता ही नहीं है। अतएव जो युक्तियां मूर्तिपूजा की सिद्धि में श्री स्वामी विवेकानन्द ने दी हैं वे हेत्वाभास एवं भ्रान्त हैं।
[स्रोत : हितकारी प्रकाशन समिति हिण्डौन सिटी द्वारा प्रकाशित तथा डॉ विवेक आर्य द्वारा सम्पादित "मूर्तिपूजा शंका-समाधान", पृष्ठ 25-26, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]